सृष्टि के प्रथम सूत्रधार भगवान विश्वकर्मा हैं ‘

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भगवान विश्वकर्मा वैदिक देवता के रूप में मान्य है। आरंभिक काल से ही उनके प्रति आदर और सम्मान का भाव देवताओं तथा मानवों का रहा है। देव विश्वकर्मा को गृहस्थ जैसी संस्था के लिए आवश्यक सुविधाओं का निर्माता तथा प्रवर्तक कहा और माना गया है। शिल्पी विश्वकर्मा सृष्टि के प्रथम सूत्रधार कहे गए है –“दैवो सौ सूत्रधारः जगदखिल हितः ध्यायते सर्वसत्वै।”
विश्वकर्मा देवताओं का “वर्धकी या देव-बढ़ई” कहे जाते है। इन्होंने इंद्रपुरी, यमपुरी, वरुणपुरी,कुबेरपुरी,पाण्डवपुरी, सुदामापुरी, शिवमण्डलपुरी और इंद्रजाल का अविष्कार किया तथा सभी देवों के भवन,पुष्पक विमान तथा उनके दैनिक उपयोग में लाने वाली प्रत्येक वस्तुओं का निर्माण किया है। देवताओं के ‘इंजीनियर’ कहलाने वाले विश्वकर्माजी ने जगन्नाथ मंदिर की मूर्तियाँ, कर्ण का कुण्डल, विष्णु भगवान का सुदर्शन चक्र,शंकरजी का त्रिशूल,यमराज का कालदंड तथा चाँद साहूकार का भवन भी बनाया था जिसमें माँ मनसा के कहने पर साँप के आ सकने लायक छिद्र छोड़ दिया था।
हमारे धर्म शास्त्रों और ग्रंथों में विश्वकर्माजी के पांच स्वरूपों और अवतारों का वर्णन मिलता है,जो क्रमशः विराट विश्वकर्मा, धर्मवंशी विश्वकर्मा,अंगिरा वंशी विश्वकर्मा, सुधन्वा विश्वकर्मा तथा भृगवंशी विश्वकर्मा है।
विश्वकर्मा पुराण के अनुसार भी देव विश्वकर्माजी के पांच पुत्र- मनु,,मय ,त्वष्टा ,शिल्पी तथा देवज्ञ है।
ऋषि मनु विश्वकर्मा ने ‘मानव सृष्टि की’ रचना की। इनके वंशज ‘लोहकार’ के रूप में जाने जाते है। सनातन ऋषि मय ने “इंद्रजाल सृष्टि” की रचना की। इनके वंशज “काष्ठ कार”(बढ़ई)के रूप में जाने जाते है। महर्षि त्वष्टा के वंशज ‘ताम्रक’ के रूप में जाने जाते है। महर्षि शिल्पी की कलाओं का वर्णन मानव जाति क्या देवगण भी नहीं कर पाये थे। इनके वंशज “संगतराश” व “मूर्तिकार” कहलाते हैं। महर्षि देवज्ञ के वंशज “स्वर्णकार” कहे जाते हैं। चूँकि इनकी सारी रचनायें लोकहित कारणी हैं इसलिए ये पांचों विश्वकर्मा पुत्र वंदनीय ब्राह्मण हैं। इनके बिना कोई भी यज्ञ अधूरा है। ये घर,भवन,मूर्तियाँ,अलंकारों व औजारों का निर्माण करने वाले हैं। इन पांचों पुत्रों ने अपनी छेनी -हथौड़ी और अपनी उंगलियों से निर्मित कलायें जो दर्शकों को अचंभित कर देती हैं वह अपने वंशजों को कार्य सौंपकर अपनी कलाओं को सारे संसार में फैलाया और आदियुग से आजतक अपने-अपने कार्य को संभालते चले आ रहे हैं। 17 सितंबर को मनाया जाने वाला त्यौहार मात्र कल-कारखानों या औद्योगिक संस्थानों तक ही सीमित नहीं बल्कि सार्वजनिक तौर से बड़े ही उत्साह और भाईचारे के साथ विश्वकर्मा जयंती मनाई जाती है। प्रसाद के रूप में मोतीचूर के लड्डू ,बुंदिया तथा विभिन्न तरह के कटे फल वितरित किये जाते हैं। नवीन परिधानों में संस्थानों, कारखानों, संगठनों व प्रतिष्ठानों के मालिक और वर्कर बहुत जोश-खरोश के साथ इस सार्वजनिक अवकाश को बाबा विश्वकर्मा की मूर्ति की पूजा-आराधना करके ,कुछ नाच-गाकर तो कई मतवाले होकर अपनी श्रद्धा और ख़ुशी जाहिर करते हैं।

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